असदुद्दीन ओवैसी को पश्चिम बंगाल चुनाव में लगातार दूसरी बार बड़ा झटका लगा है। उनकी पार्टी AIMIM सभी 11 सीटों पर हार गई और सिर्फ 0.09 फीसदी वोट हासिल कर सकी। इस चुनाव में ओवैसी ने शुरुआत में हुमायूं कबीर के साथ गठबंधन किया था, लेकिन एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद उन्होंने दूरी बना ली। इसके बावजूद हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी से दो सीटों पर जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि बंगाल में गठबंधन टूटना ओवैसी की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती साबित हुई।
यूपी में नए गठबंधन की चर्चा तेज
अब चर्चा इस बात की है कि बंगाल की हार के बाद ओवैसी उत्तर प्रदेश में नई रणनीति बना सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह अटकल तेज है कि AIMIM अगर मायावती की पार्टी बीएसपी या चंद्रशेखर आजाद के साथ गठबंधन करती है तो यूपी की राजनीति में बड़ा असर पड़ सकता है। माना जा रहा है कि दलित-मुस्लिम समीकरण बनाने की कोशिश सपा के लिए चुनौती बन सकती है। इसी वजह से लखनऊ की राजनीति में ओवैसी की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है।
अखिलेश यादव के लिए क्यों चिंता?
अखिलेश यादव लंबे समय से यूपी में मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा चेहरा माने जाते रहे हैं। लेकिन अगर AIMIM किसी मजबूत दल के साथ मैदान में उतरती है तो मुस्लिम वोटों का बंटवारा सपा के लिए नुकसानदायक हो सकता है। बंगाल चुनाव के आंकड़ों ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। मुस्लिम बहुल सीटों पर बीजेपी को बड़ी सफलता मिली जबकि टीएमसी कई इलाकों में पिछड़ गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वोटों का बिखराव बड़े दलों की हार का कारण बन सकता है।
मुस्लिम नेतृत्व पर ओवैसी का जोर
पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद ओवैसी ने कहा था कि मुसलमानों को अपनी राजनीतिक लीडरशिप तैयार करनी चाहिए। उनका कहना था कि तथाकथित सेक्युलर पार्टियां बीजेपी को रोकने में नाकाम रही हैं। इसी बयान के बाद यूपी में नई राजनीतिक संभावनाओं की चर्चा और तेज हो गई। AIMIM पहले भी 2017 और 2022 में यूपी चुनाव लड़ चुकी है, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिली। फिर भी ओवैसी लगातार राज्य में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
बंगाल के नतीजों से बढ़ी बेचैनी
बंगाल चुनाव में मुस्लिम बहुल इलाकों में हुए बदलाव ने विपक्षी दलों की चिंता बढ़ा दी है। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे क्षेत्रों में बीजेपी की मजबूत एंट्री ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए। यही वजह है कि यूपी में भी अब मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति पर नई बहस शुरू हो गई है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर छोटे दलों का गठबंधन मजबूत हुआ तो आने वाले चुनावों में सपा और कांग्रेस दोनों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
यूपी की राजनीति में बढ़ेगा मुकाबला
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 19 फीसदी मानी जाती है और कई सीटों पर उसका सीधा असर पड़ता है। ऐसे में AIMIM अगर किसी बड़े सामाजिक समीकरण के साथ मैदान में उतरती है तो मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। फिलहाल सभी दल आने वाले चुनावों से पहले अपनी रणनीति मजबूत करने में जुटे हुए हैं।