प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है। पीएम मोदी ने लोगों से कहा कि कम से कम एक साल तक सोना खरीदने से बचें। इसके साथ उन्होंने विदेश यात्राएं टालने और वर्क फ्रॉम होम अपनाने की भी सलाह दी। इस बयान के बाद सोने से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली। गांव से लेकर शहर तक हर जगह यही सवाल उठने लगा कि आखिर सरकार सोना न खरीदने की बात क्यों कर रही है और क्या इससे आम लोगों की जिंदगी पर असर पड़ेगा।
विदेशी मुद्रा पर बढ़ा दबाव
असल में पीएम मोदी की यह अपील सीधे देश के विदेशी मुद्रा भंडार और आयात बिल से जुड़ी हुई है। भारत इस समय अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना विदेशों से खरीदता है और उसका भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स और आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2026 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 691 बिलियन डॉलर रह गया है। वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने अनुमान लगाया है कि 2026 में भारत का चालू खाता घाटा 84.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
सोना बना बड़ी चिंता
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 72 बिलियन डॉलर का सोना आयात किया। यह पिछले साल के मुकाबले करीब 24 प्रतिशत ज्यादा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना खरीदने वाला देश माना जाता है। आंकड़े बताते हैं कि कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी करीब 10 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसी वजह से सरकार चाहती है कि लोग कुछ समय तक सोने की खरीद कम करें ताकि डॉलर की बचत हो सके और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हो।
तेल संकट ने बढ़ाई परेशानी
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिल रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में तेल के बढ़ते दामों ने देश की आर्थिक चिंता और बढ़ा दी है। सरकार को तेल, गैस और दूसरी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। ऐसे में अगर सोने का आयात घटता है तो वही डॉलर जरूरी ऊर्जा जरूरतों पर खर्च किए जा सकेंगे।
कितनी हो सकती है बचत
आर्थिक जानकारों के मुताबिक अगर देश में सोने की मांग 30 से 40 प्रतिशत तक भी घटती है तो भारत करीब 25 बिलियन डॉलर बचा सकता है। अगर आयात आधा हो जाए तो करीब 36 बिलियन डॉलर की बचत संभव है। वहीं पूरे एक साल तक सोना न खरीदने पर लगभग 72 बिलियन डॉलर बच सकते हैं। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 6.84 लाख करोड़ रुपये बैठती है। इससे देश के चालू खाता घाटे को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
सरकार का क्या है संदेश
सरकार ने साफ किया है कि यह कोई कानूनी पाबंदी नहीं बल्कि एक नैतिक अपील है। पीएम मोदी का मकसद लोगों को यह समझाना है कि वैश्विक संकट के समय आर्थिक संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी होता है। सरकार चाहती है कि लोग फिलहाल जरूरत के हिसाब से खर्च करें और विदेशी मुद्रा बचाने में सहयोग दें। आने वाले समय में वैश्विक हालात कैसे बदलते हैं अब सबकी नजर इसी पर टिकी हुई है।