2027 से पहले यूपी की राजनीति में बढ़ी नई हलचल, मायावती के बंद दरवाजे से कांग्रेस की बढ़ी बेचैनी?

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में मिशन 2027 को लेकर अचानक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस नेताओं की एक मुलाकात ने ऐसा संदेश दिया जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक चर्चा बढ़ा दी। मायावती से मिलने पहुंचे नेताओं को मुलाकात का समय नहीं मिला और यहीं से राजनीतिक चर्चाओं का नया दौर शुरू हो गया। अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या विपक्षी एकता की तस्वीर बनने से पहले ही कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।

मुलाकात पर सवाल
कांग्रेस अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और सांसद तनुज पुनिया मायावती के आवास पहुंचे थे। बाद में कांग्रेस नेताओं ने कहा कि वे सिर्फ हालचाल जानने के लिए गए थे। लेकिन राजनीतिक गलियारों में सवाल यही उठा कि अगर यह केवल शिष्टाचार मुलाकात थी तो फिर पहले से समय क्यों तय नहीं किया गया था।

पुराने रिश्तों की कहानी
मायावती और कांग्रेस के रिश्ते हमेशा उतार चढ़ाव वाले रहे हैं। कभी साथ आने की कोशिश हुई तो कभी दूरी बढ़ती चली गई। 1996 से लेकर 2019 तक कई राजनीतिक प्रयोग हुए लेकिन भरोसे की कमी हमेशा बनी रही। कभी समर्थन मिला तो कभी अलग रास्ता चुना गया। इसी वजह से दोनों दलों के रिश्तों में स्थिरता कभी दिखाई नहीं दी।

दूरी की वजह
बसपा की राजनीति का सबसे मजबूत आधार दलित वोट बैंक रहा है। माना जाता है कि मायावती हमेशा अपने सामाजिक आधार को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं। राहुल गांधी लगातार दलित समाज के बीच सक्रिय दिखाई देते रहे हैं। ऐसे में बसपा को यह डर भी रहता है कि कहीं उसका पारंपरिक जनाधार प्रभावित न हो जाए। यही वजह है कि दोनों दलों के बीच दूरी अक्सर बनी रहती है।

2027 की तैयारी
मायावती कई बार साफ कर चुकी हैं कि बसपा अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। पार्टी संगठन में लगातार बदलाव किए जा रहे हैं। बूथ स्तर पर मजबूती और सामाजिक समीकरणों को फिर से साधने की कोशिश चल रही है। बसपा का पूरा फोकस अपनी पुरानी ताकत वापस लाने और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करने पर दिखाई दे रहा है।

आगे क्या होगा
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तर प्रदेश में विपक्ष एकजुट हो पाएगा या फिर अलग अलग रास्तों पर चलता रहेगा। कांग्रेस चाहती है कि भाजपा के खिलाफ बड़ा मोर्चा तैयार हो लेकिन मायावती का रुख अभी अलग संकेत दे रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने सपा और कांग्रेस दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब राजनीतिक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में बहनजी का अगला कदम क्या होगा और मिशन 2027 की तस्वीर किस दिशा में जाती दिखाई देगी। जिसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार लगातार बेहद गर्म बना हुआ।

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