उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक बदलाव सामने आया है। पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि पंचायत चुनाव मई के अंत तक कराए जा सकते हैं, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। योगी आदित्यनाथ कैबिनेट की बैठक में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से पहले अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए नए आयोग के गठन को मंजूरी दे दी गई है। इस फैसले के बाद पंचायत चुनाव की प्रक्रिया फिलहाल लंबी होती दिखाई दे रही है।
आयोग करेगा अध्ययन
सरकार ने ‘उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ के गठन को मंजूरी दी है। यह आयोग पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण का आधार तय करेगा। आयोग प्रदेश में पिछड़े वर्गों की स्थिति, सामाजिक भागीदारी और जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन करेगा। सरकार का कहना है कि आरक्षण बिना सटीक और वैज्ञानिक अध्ययन के तय नहीं किया जाएगा। आयोग अपनी रिपोर्ट छह महीने के भीतर सरकार को सौंपेगा।
सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा मामला
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद लिया गया है। अदालत ने पंचायत चुनावों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे। अब आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही आरक्षण लागू होगा। ऐसे में जब तक अध्ययन और रिपोर्ट की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक पंचायत चुनाव कराना मुश्किल माना जा रहा है। यही वजह है कि अब चुनाव की संभावित तारीखों पर नया सस्पेंस खड़ा हो गया है।
चार चरणों में प्रक्रिया
पूरी प्रक्रिया को चार चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में हाईकोर्ट के रिटायर जज की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय आयोग बनाया जाएगा। दूसरे चरण में प्रदेश के सभी 75 जिलों में सर्वे किया जाएगा। तीसरे चरण में आयोग की रिपोर्ट के आधार पर आनुपातिक आरक्षण तय होगा। चौथे और अंतिम चरण में चक्रानुक्रम व्यवस्था के अनुसार चुनाव की अधिसूचना जारी की जाएगी और चुनाव का रास्ता साफ होगा।
विधानसभा चुनाव का असर
आयोग का कार्यकाल छह महीने तय किया गया है। इसके बाद रिपोर्ट, आपत्तियां और उनकी समीक्षा जैसी प्रक्रियाएं भी पूरी होंगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव फरवरी और मार्च 2027 में होने हैं। ऐसे में अब यह संभावना मजबूत मानी जा रही है कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जाएं।
अब बढ़ी सियासी हलचल
पंचायत चुनाव सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं माने जाते बल्कि इन्हें गांव की राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। पंचायत चुनाव के जरिए जमीनी राजनीतिक ताकत का अंदाजा भी लगाया जाता है। ऐसे में आयोग गठन के फैसले ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आयोग कितनी जल्दी रिपोर्ट देता है और पंचायत चुनाव का रास्ता आखिर कब साफ होता है।







Leave a Reply