उत्तर प्रदेश के गांवों में इन दिनों पंचायत चुनाव से ज्यादा चर्चा एक नए सवाल की हो रही है। सवाल यह है कि 26 मई के बाद गांव की कमान आखिर किसके हाथ में होगी। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, लेकिन दूसरी तरफ पंचायत चुनाव को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं दिखाई दे रही। यही वजह है कि गांवों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
चुनाव से पहले बढ़ा सस्पेंस
जानकारी के अनुसार 26 मई को ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। इसके बाद 11 जुलाई को जिला पंचायत और 19 जुलाई को क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल भी खत्म होना है। लेकिन पंचायत चुनाव की प्रक्रिया अभी अंतिम स्थिति तक नहीं पहुंची है। ऐसे में अब यह सवाल लगातार उठ रहा है कि अगर चुनाव में देरी होती है तो प्रशासनिक व्यवस्था कैसे चलेगी और गांव की जिम्मेदारी किसे मिलेगी।
प्रधानों की नई मांग ने बढ़ाई चर्चा
इस बीच प्रधान संघ और ब्लॉक प्रमुख संघ की तरफ से नई मांग सामने आई है। मांग की जा रही है कि अगर चुनाव में देरी होती है तो मौजूदा चुने हुए प्रतिनिधियों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी दी जाए। उनका कहना है कि गांव की जरूरतों और समस्याओं को वही लोग बेहतर तरीके से समझ सकते हैं जो लंबे समय से जनता के बीच काम कर रहे हैं। इसी वजह से यह मुद्दा अब तेजी से चर्चा का विषय बन गया है।
सरकार तक पहुंचा प्रस्ताव
सूत्रों के अनुसार पंचायत संगठनों की तरफ से यह मांग सरकार तक पहुंचाई जा चुकी है। साथ ही बड़े स्तर पर बातचीत और मुलाकात की तैयारी भी की जा रही है। कुछ राज्यों में पहले ऐसी व्यवस्था लागू होने के दावे भी किए जा रहे हैं। हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। अब गांवों में अलग-अलग तरह की चर्चाएं और अटकलें बढ़ती दिखाई दे रही हैं।
हाईटेक होगी चुनाव व्यवस्था
उधर पंचायत चुनाव को लेकर तकनीकी तैयारी भी तेज होती दिख रही है। इस बार मतदान प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और आधुनिक बनाने की योजना बनाई जा रही है। मतदान केंद्रों की रियल टाइम निगरानी, कंट्रोल रूम से सीधी नजर और गतिविधियों की तुरंत जानकारी देने जैसी व्यवस्था पर काम किया जा रहा है। इसके साथ फर्जी मतदान रोकने के लिए भी नई तकनीक लाने की तैयारी बताई जा रही है।
अब फैसले पर टिकी नजर
फिलहाल पंचायत चुनाव से पहले आया यह नया मोड़ गांव की राजनीति को और दिलचस्प बना रहा है। एक तरफ कार्यकाल समाप्त होने का समय नजदीक है तो दूसरी तरफ चुनाव और नई जिम्मेदारी को लेकर असमंजस बना हुआ है। अब सबकी नजर सरकार और आयोग के अगले फैसले पर टिकी हुई है क्योंकि इस बार चर्चा सिर्फ चुनाव की नहीं बल्कि गांव की सत्ता और जिम्मेदारी की भी हो रही है।







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